Maharashtra SIR And ECINet Controversy : महाराष्ट्र में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया अपने उस दौर में पहुंच गई है, जहां लोगों को नोटिस भेजे जा रहे। इसी गहमागहमी के बीच बड़ा प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को पत्र भेजकर चुनाव प्रबंधन सॉफ्टवेयर ECINet में चार जरूरी बदलाव करने की सिफारिश की है। इस पत्र का मुख्य मकसद जमीनी स्तर पर तैनात इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन अधिकारियों (ERO) को वे संवैधानिक अधिकार वापस दिलाना है, जो कानून उन्हें पहले से देता है, लेकिन सॉफ्टवेयर की पाबंदियों के कारण वे उनका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे।
किन-किन भेजा गया पत्र?
यह पत्राचार 24 सितंबर को किया गया था। इसे चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों, जैसे-वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) महानिदेशक सीमा खन्ना और आयोग के अन्य प्रमुख प्रतिनिधियों को भेजा गया था। इस पत्र के सामने आने से ठीक एक दिन पहले यह बात उजागर हुई थी कि दो चुनाव आयुक्तों ने खुद इस बात पर अपनी गंभीर आपत्ति जताई थी कि सेंट्रल IT सिस्टम स्थानीय अधिकारियों की शक्तियों को सीमित कर रहा है। इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि बेहद गंभीर है। 31 अगस्त को जारी हुई महाराष्ट्र की शुरुआती मतदाता सूची से 21.1% मतदाताओं के नाम बाहर हो चुके हैं। अब सबकी नजरें 16 नवंबर पर टिकी हैं, जब राज्य की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जानी है।
क्या होती है लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी?
जनता के बीच लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी शब्द को लेकर भ्रम है। आसान शब्दों में कहें तो इसका यह कतई मतलब नहीं है कि किसी नागरिक का वोट देने का अधिकार छीन लिया गया या उसे अयोग्य घोषित कर दिया गया है। यह दरअसल चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ECINet द्वारा पकड़ी गई एक तरह की तकनीकी विषमता या डेटा की गड़बड़ी है। जब यह सॉफ्टवेयर किसी नए या मौजूदा मतदाता के रिकॉर्ड को पिछले पुनरीक्षण अभियानों के डेटा से मिलाने की कोशिश करता है और उसमें उसके माता-पिता या दादा-दादी के रिकॉर्ड जोड़ता है, तब कुछ कमियों के कारण सिस्टम में रेड फ्लैग या डिस्क्रेपेंसी दिखने लगती है।
इसके मुख्य कारणों में ये बातें हैं-
नामों की वर्तनी में अंतर : पुरानी और नई सूची में माता-पिता या अभिभावक के नाम की स्पेलिंग अलग होना।
उम्र का अस्वाभाविक अंतर : कागजों में माता-पिता और बच्चे की उम्र के बीच 15 साल से कम या फिर 50 साल से अधिक का अंतर दर्ज होना।
उम्र की गलत गणना : पिछले वर्षों के रिकॉर्ड की तुलना में मतदाता की उम्र का सही अनुपात में न बढ़ना।
दस्तावेजों की कमी : मतदाता द्वारा पहचान का कोई पुख्ता प्रमाण न देना, अथवा सत्यापन के लिए केवल आधार कार्ड की प्रति जमा करना।
इन तकनीकी खामियों के कारण लाखों मतदाताओं के नाम पर संशय बन जाता है और उन्हें नोटिस जारी कर दिए जाते हैं।
केंद्रीकृत नियंत्रण और कानून के टकराव का मुद्दा
इस विवाद की जड़ें सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं हैं। अगस्त में वरिष्ठ अधिकारी संधू ने बेहद कड़ा पत्र लिखकर चेताया था कि मतदाता सूची तैयार करने वाले जमीनी अधिकारी-जैसे CEO, DEO और ERO-अपनी कानूनी जिम्मेदारियों को निभाने में असमर्थ साबित हो रहे। उनका आरोप था कि नई दिल्ली में DG (IT) के स्तर पर ERONet और ECINet का पूरा कंट्रोल सेंट्रलाइज्ड कर दिया गया है। भारतीय संविधान एवं चुनावी कानूनों के अनुसार मतदाता सूची को सही और निष्पक्ष बनाए रखने की पूरी कानूनी जिम्मेदारी ERO, DEO और CEO की होती है। मगर, व्यावहारिक धरातल पर सॉफ्टवेयर का एक्सेस कंट्रोल केंद्रीय IT विभाग के हाथ में होने के कारण स्थानीय अधिकारी असहाय महसूस कर रहे। महाराष्ट्र CEO द्वारा 24 सितंबर को लिखे गए पत्र में भी इसी चिंता को दोहराया गया और चार प्रमुख संशोधनों की मांग की गई।
महाराष्ट्र CEO द्वारा मांगे गए 4 मुख्य बदलाव
महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने पत्र के जरिए उन व्यावहारिक समस्याओं को सामने रखा जो ERO को काम करने से रोक रही हैं-
1. व्यक्तिगत सुनवाई से छूट का विकल्प : कानूनन ERO के पास यह अधिकार है कि वह तय करे कि किसी व्यक्ति को अपने समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना जरूरी है या नहीं। मगर, ECINet के Take Action मेन्यू में ऐसा कोई ऑप्शन ही नहीं था, जिससे अधिकारी किसी को सुनवाई से छूट दे सके। CEO ने मांग की है कि सॉफ्टवेयर में Exempted from Hearing का तीसरा विकल्प जोड़ा जाए। इससे उन नागरिकों को राहत मिलेगी, जो पहले ही वैध दस्तावेज जमा कर चुके हैं। खासकर बुजुर्गों, दिव्यांगों और गर्भवती महिलाओं को दफ्तरों के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी।
2. दस्तावेजों की व्यापक सूची : वर्तमान में नोटिस के साथ केवल 13 प्रकार के स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची दी जाती है। CEO का कहना है कि यह सूची अंतिम नहीं हो सकती। उन्होंने मांग की कि 14वें विकल्प के रूप में Other/ Other Equivalent Document को शामिल किया जाए। समाज के वंचित वर्गों जैसे आदिवासी, बेघर लोग और सेक्स वर्कर्स के पास अक्सर पारंपरिक 13 दस्तावेज नहीं होते। ऐसे में अन्य सरकारी या स्थानीय प्रमाणों को स्वीकार करने का अधिकार ERO को मिलना चाहिए।
3. स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता : कई बार ERO केवल बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) की रिपोर्ट के आधार पर किसी विसंगति को दूर नहीं कर पाता और फाइल को जांच के लिए जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) के पास भेजना पड़ता है। कानून कहता है कि यदि ERO उपलब्ध साक्ष्यों से संतुष्ट है तो वह स्वयं अंतिम फैसला ले सकता है। CEO ने मांग की है कि यदि ERO को लगता है कि कोई नागरिक पात्र है तो सॉफ्टवेयर उसे तुरंत नाम शामिल करने की अनुमति दे।
4. अनिवार्य डॉक्यूमेंट अपलोड की शर्त में ढील : मौजूदा ECINet सिस्टम में हर मामले का निपटारा करने के लिए Extract of Last SIR (पिछले पुनरीक्षण का उद्धरण) अपलोड करना अनिवार्य बनाया गया है। चूंकि गड़बड़ी की पहचान ही पिछले डेटा के आधार पर हुई है, इसलिए इसे दोबारा अपलोड करने की अनिवार्यता प्रक्रिया को धीमा करती है। CEO ने इसे mandatory की जगह optional बनाने का सुझाव दिया है। इसके अलावा CEO ने एक पांचवीं मांग यह भी रखी कि मौखिक निर्देशों के बजाय चुनाव आयोग स्पष्ट FAQ और लिखित दिशा-निर्देश जारी करे, ताकि अधिकारी बिना किसी भ्रम के काम कर सकें।
कानूनी ढांचा और जमीनी हकीकत
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 भारत में लोकतंत्र की नींव हैं। ये कानून हर विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची तैयार करने का पूरा प्रभार इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) को देते हैं, जो आमतौर पर एसडीएम स्तर का प्रशासनिक अधिकारी होता है। भारत में चुनावी व्यवस्था को जानबूझकर विकेंद्रीकृत बनाया गया था, ताकि सत्ता का केंद्र एक जगह न हो और मतदाता सूची में हेरफेर के आरोप न लग सकें। कानूनन आज भी ERO ही अंतिम निर्णयकर्ता है, लेकिन डिजिटल युग में सॉफ्टवेयर का कोड यह तय करने लगा है कि ERO क्या बटन दबा सकता है और क्या नहीं। दिल्ली स्थित IT विभाग के सर्वर में मौजूद सीमित विकल्पों ने ERO की संवैधानिक शक्तियों को बांधकर रख दिया था।
चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और सुधार के कदम
शुरुआती प्रतिक्रिया में चुनाव आयोग ने कहा था कि उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म डेटा सुरक्षा के सख्त नियमों पर काम करते हैं और अधिकारियों के पास पर्याप्त अधिकार हैं। वैसे, भारी दबाव और 26 सितंबर को हुई चुनाव आयोग की उच्चस्तरीय बैठक के बाद आयोग का रुख बदला। आयोग ने बयान जारी कर महाराष्ट्र की कई मांगों को स्वीकार करने का संकेत दिया। आयोग ने माना कि ERO को कुछ श्रेणियों में व्यक्तिगत सुनवाई से छूट देने का अधिकार सॉफ्टवेयर में दिया जाएगा। साथ ही पिछले कुछ महीनों में राज्यों से मिले सुझावों के आधार पर पोर्टल में बदलाव करने की बात कही गई।
चुनाव आयोग की इस बैठक में आठ अन्य दूरगामी फैसले भी लिए गए, जो आयोग में पारदर्शी कामकाज को बढ़ावा देंगे-
- हर बैठक का एजेंडा पहले से सदस्यों को मिलेगा और उसके मिनट्स जारी होंगे।
- अधिकारियों की विदेश यात्राओं पर आयोग की पूर्व मंजूरी अनिवार्य होगी।
- नए IT पोर्टलों की समीक्षा के लिए अधिकारियों की एक विशेष समिति बनेगी।
- ECINet का तकनीकी रिव्यू वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त और IIT/ IIIT के स्वतंत्र एक्सपर्ट्स करेंगे।
- फील्ड में तैनात अफसरों को सॉफ्टवेयर में जरूरत के मुताबिक पूरे एक्सेस और अधिकार दिए जाएंगे।
इन फैसलों से साफ होता है कि तकनीक को प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाओं में सहायता के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि अधिकारियों के हाथ बांधने के लिए। चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए इन सुधारात्मक कदमों से आगामी चुनावों में मतदाता सूची अधिक सटीक और पारदर्शी बनने की उम्मीद जताई जा रही है।