Congress On Akhilesh Yadav Raibareli Rath Yatra : यूपी विधानसभा चुनाव दूर हैं, लेकिन इंडिया गठबंधन के प्रमुख घटकों- सपा और कांग्रेस के बीच तल्खी साफ दिखने लगी है। विवाद की ताजा वजह समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की पीडीए रथ यात्रा बनी है, जिसे उन्होंने कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ रायबरेली और अमेठी की तरफ मोड़ दिया है। सपा के इस कदम से प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व बेहद असहज और असहमत दिख रहा। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने अखिलेश के इस दौरे पर कहा कि सपा नेता रायबरेली और अमेठी में सियासी आधार तलाश रहे हैं तो कांग्रेस कार्यकर्ता भी कन्नौज और इटावा जाकर अपना जनाधार बढ़ा सकते हैं। बता दें, रायबरेली और अमेठी को गांधी परिवार की परंपरागत राजनीतिक जमीन माना जाता है। जबकि इटावा और कन्नौज अखिलेश यादव के परिवार और पार्टी के मजबूत किले रहे हैं।
असंतोष अजय राय तक सीमित नहीं
गठबंधन के बीच सीटों के बंटवारे और वर्चस्व को लेकर यह असंतोष सिर्फ अजय राय तक सीमित नहीं है। इससे पहले सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद भी सार्वजनिक रूप से चेतावनी दे चुके हैं कि यदि आगामी चुनाव में कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें नहीं दी गईं तो इसके नतीजे गठबंधन के हित में नहीं होंगे। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि 2019 के मुकाबले अब पार्टी का जनाधार काफी मजबूत हो चुका है, इसलिए उसे कमतर आंकना सपा की भूल होगी।
रायबरेली की 4 विधानसभा सीटों पर सपा का कब्जा
दूसरी ओर अखिलेश यादव ने अपनी पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) यात्रा के माध्यम से 2027 के लिए बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। रायबरेली जिले की 6 में से 4 विधानसभा सीटों पर अखिलेश की पार्टी का कब्जा है। इस चलते अखिलेश इस क्षेत्र में दबदबा कायम रखने में जुटे हैं।
आपस में ही शक्ति प्रदर्शन नहीं करना चाहिए
अजय राय ने याद दिलाया कि मुख्य विपक्षी दलों की प्राथमिकता भाजपा सरकार की नीतियों, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ मिलकर लड़ना होना चाहिए, न कि आपस में ही शक्ति प्रदर्शन करना। राहुल गांधी देश स्तर पर जनता के वास्तविक मुद्दे उठा रहे और लोग लगातार कांग्रेस से जुड़ रहे हैं। फिलहाल रायबरेली में सपा कार्यकर्ताओं के झंडों और नारों के बीच निकला यह शक्ति प्रदर्शन गठबंधन के भविष्य पर सवालिया निशान खड़े कर रहा है। चुनावी घमासान शुरू होने से पहले जिस तरह दोनों दल एक-दूसरे के गढ़ में सेंधमारी की बात कर रहे, उससे स्पष्ट है कि आगामी सीट शेयरिंग पर बातचीत बेहद चुनौतीपूर्ण होगी।