Supreme Court News : सर्वोच्च न्यायालय ने आज उस याचिका पर विचार करने से साफ मना कर दिया, जिसमें देशभर के स्कूलों में संविधान की प्रस्तावना का नियमित पाठ करवाने का आदेश देने की मांग हुई थी। शीर्ष अदालत के जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना को पहले से स्कूली पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाया जा चुका है। बच्चे कक्षा छह से ही इसे पढ़ते आ रहे हैं। ऐसे में इसके लिए किसी अलग से राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता नहीं है।

याचिकाकर्ता ने क्या तर्क दिया था?

यह याचिका दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत धीरज कुमार की ओर से दायर की गई थी। इसमें उन्होंने शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई को यह निर्देश देने का अनुरोध किया था कि बच्चों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति समझ विकसित करने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए। याचिकाकर्ता की दलील थी कि जिस तरह स्कूली सुबह की प्रार्थना सभा में बच्चे राष्ट्रगान गाते हैं, ठीक उसी तर्ज पर रोजाना सामूहिक रूप से प्रस्तावना का पाठ कराया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि ऐसा करने से छोटी उम्र से बच्चों के मन में न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे मूलभूत आदर्शों की भावना मजबूत होगी।

राजस्थान, कर्नाटक और सीबीएसई के सर्कुलर का दिया गया हवाला

अपनी दलील के समर्थन में याचिकाकर्ता ने राजस्थान, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के फैसलों का उल्लेख किया, जहां सुबह की असेंबली में प्रस्तावना का वाचन अनिवार्य या प्रोत्साहित किया गया है। याचिका में कहा गया था कि इन राज्यों के मॉडल को अपनाकर पूरे देश के लिए एक समान व्यवस्था बनाई जा सकती है। इसके अलावा मई 2025 में जारी सीबीएसई के उस सर्कुलर की ओर भी ध्यान दिलाया गया, जिसमें स्कूलों को अपनी असेंबली में सकारात्मक और नैतिक विचारों को शामिल करने की सलाह दी गई थी। याचिकाकर्ता के अनुसार रोजाना प्रस्तावना का पाठ इस सर्कुलर के उद्देश्य को पूरा करने का सबसे बेहतर तरीका हो सकता था। हालांकि, अदालत ने इस पर आगे विचार करने से इनकार कर दिया।