राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने जनगणना और देश की जनसंख्या नीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से जनसंख्या और जनसांख्यिकी से जुड़े विषयों पर पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है और इनके आधार पर प्रभावी नीतियां भी तैयार नहीं की गई हैं। आंबेकर ने यह भी कहा कि भारत की आबादी बढ़ने को देश की अलग-अलग समस्याओं की मुख्य वजह के तौर पर देखने की धारणा लंबे समय तक बनी रही। उनके मुताबिक इस विषय को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय तथ्यों और वस्तुनिष्ठ अध्ययन के आधार पर समझने की जरूरत है।
जनगणना की शुरुआत को लेकर क्या कहा?
सुनील आंबेकर ने जनगणना की ऐतिहासिक प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहा कि भारत में इसकी शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। उनके अनुसार, उस दौर में समाज को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने और आंकड़ों का इस्तेमाल आपसी दूरियां बढ़ाने या विभाजनकारी उद्देश्यों के लिए करने का प्रयास किया गया था। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद इस पूरी प्रक्रिया और इसके प्रभावों का अध्ययन करके भविष्य के लिए नीतियां बनाई जानी चाहिए थीं। उनके मुताबिक ऐसा पर्याप्त रूप से नहीं किया गया।
बढ़ती आबादी हर समस्या की वजह नहीं
आंबेकर ने कहा कि देश में लंबे समय तक जनसंख्या वृद्धि को कई समस्याओं का मूल कारण बताया जाता रहा। उनका कहना था कि नीतिगत कमियों और अन्य कारणों पर गंभीरता से विचार करने के बजाय, लगातार बढ़ रही आबादी को ही हर समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराने की सोच को बढ़ावा दिया गया है। उन्होंने विशेष रूप से आपातकाल से पहले के दौर का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय जनसंख्या नियंत्रण को कई समस्याओं के समाधान के तौर पर पेश किया गया था।
राजनीतिक इस्तेमाल से बचने की बात
आरएसएस प्रचार प्रमुख ने यह भी कहा कि जनसंख्या जैसे संवेदनशील विषयों को किसी राजनीतिक दल के फायदे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने इस तरह के मुद्दों पर राजनीतिक दखल और गलत इस्तेमाल से बचने की जरूरत बताई। उनके मुताबिक जनसंख्या और जनसांख्यिकी से जुड़े सवालों को भावनात्मक या राजनीतिक बहस के बजाय तथ्यों के आधार पर समझना ज्यादा जरूरी है।
धर्मनिरपेक्ष बनाम सांप्रदायिक बहस पर टिप्पणी
आंबेकर ने इस बात पर जोर दिया कि देश में आज भी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेकने और तुष्टिकरण की राजनीति करने के प्रयास किए जाते हैं। उन्होंने इस विषय को धर्मनिरपेक्ष बनाम सांप्रदायिक बहस तक सीमित नहीं रखने की बात कही। उन्होंने जोर दिया कि ऐसे मुद्दों को व्यापक और वस्तुनिष्ठ नजरिए से देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार राष्ट्रीय अखंडता, एकता, सुरक्षा और देश की सांस्कृतिक पहचान एवं मूल्यों को भी चर्चा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
नीतियां बनाने में अध्ययन पर जोर
सुनील आंबेकर के मुताबिक जनसंख्या और जनसांख्यिकी से जुड़े फैसलों के लिए विस्तृत और समर्पित अध्ययन जरूरी है। उनका कहना है कि इन विषयों पर नीतियां बनाते समय ऐतिहासिक परिस्थितियों के साथ मौजूदा सामाजिक और राष्ट्रीय जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उन्होंने इस पूरे मुद्दे को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग रखकर निष्पक्ष तरीके से देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।