Supreme Court On CEC Gyanesh Kumar : सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को तत्काल प्रभाव से पद से हटाने से जुड़ी अंतरिम अर्जी को अस्वीकार कर दिया है। ज्ञानेश कुमार पर आरोप है कि उन्होंने एसआईआर (SIR) से जुड़े 14 महत्वपूर्ण फैसले आयोग के अन्य दो सदस्यों की सहमति के बिना ही लागू कर दिए। हालांकि, मामले की गंभीरता को देखते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग समेत सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। देश के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि औपचारिक दस्तावेजों के अवलोकन से यह सिद्ध होता है कि फैसले वैधानिक सहमति या बहुमत के बिना लिए गए थे तो न्यायपालिका उन सभी फैसलों पर रोक लगाने या उन्हें निष्प्रभावी घोषित करने का अधिकार रखती है।

फॉर्म-6 के संशोधन की स्वीकृति नहीं दी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हमने फॉर्म-6 के संशोधन को मंजूरी नहीं दी है। हम देखेंगे कि इसमें किसने बदलाव किया। दरअसल, 9 दिन पहले आयोग ने यह कहा था कि SIR के लिए फॉर्म-6 के साथ लगाए गए डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिली है। SIR के अलावा सामान्य अवधि में वही फॉर्म इस्तेमाल होंगे, जो मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत निर्धारित हैं।

अदालत में बहस : वकीलों का पक्ष और पीठ की टिप्पणी

मामले की सुनवाई के समय याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने साल 2023 के निर्वाचन आयोग कानून के संवैधानिक औचित्य पर सवाल खड़े किए।

असीमित अधिकारों का आरोप : वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह का तर्क था कि 2023 के नए प्रावधानों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को अप्रत्याशित कानूनी संरक्षण दे दिया है, जिससे उनका पद बेहद ताकतवर हो गया है। निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने मांग रखी कि ज्ञानेश कुमार को कामकाजी जिम्मेदारियों से अलग कर दोनों सह-आयुक्तों को प्रभार दिया जाए।

अदालत का दृष्टिकोण : इस पर पीठ ने टिप्पणी की कि केवल समाचार पत्रों की रिपोर्टों को आधार बनाकर कोई दंडात्मक या निलंबन का आदेश जारी नहीं किया जा सकता। जजों ने कहा कि यद्यपि लोकतांत्रिक संस्थाओं में सर्वसम्मति की उम्मीद की जाती है, लेकिन सहमति न बनने की दशा में बहुमत से निर्णय लेने का कानूनी प्रावधान मौजूद है। वास्तविक स्थिति आयोग का आधिकारिक उत्तर आने के बाद ही स्पष्ट होगी।

क्या है पूरा विवाद?

यह प्रकरण एक मीडिया रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद सामने आया। उसमें कहा गया था कि चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू तथा डॉ. विवेक जोशी ने एसआईआर प्रक्रिया को लेकर हुई अंदरूनी बैठकों में अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। याचिका में दावा किया गया है कि इन असहमतियों की उपेक्षा करते हुए एकतरफा तरीके से निर्देश जारी कर दिए गए।

क्या शीर्ष अदालत CEC को निलंबित कर सकती है?

संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार उच्चतम न्यायालय के पास मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे तौर पर पद से निलंबित करने की सीधी शक्तियां नहीं हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल संसद के माध्यम से महाभियोग चलाकर ही हटाया जा सकता है। वैसे, संविधान के अनुच्छेद-324 अंतर्गत न्यायपालिका को यह पूरा अधिकार है कि वह चुनाव आयोग द्वारा लिए गए किसी भी ऐसे निर्णय की समीक्षा करे जो गैर-कानूनी या असंवैधानिक हो और आवश्यकता पड़ने पर उसे निरस्त कर दे। इस बीच, राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है और विरोधी दल आगामी संसदीय सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाने की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं।

2 पीआईएल दाखिल

एसआईआर के खिलाफ 2 पीआईएल दाखिल हुई हैं। राकेश कुमार सिंह ने ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने की मांग वाली याचिका दाखिल की थी। इनकी दलीलें अधिवक्ता विकास सिंह ने रखीं। दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दी है। इनकी तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी पेश हुईं।