Delhi SIR Notice News : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान भारत रत्न और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, मौजूदा विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और चुनाव आयुक्त एसएस संधू समेत कई प्रमुख मतदाताओं को नोटिस जारी हुए हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल, पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल और कई वरिष्ठ नौकरशाहों के नाम भी इस सूची में हैं। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कई और बड़े राजनेताओं और ब्यूरोक्रेट्स को नोटिस जारी किए जाने की बात कही है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसकी लिस्ट भी शेयर की है। चुनाव अधिकारियों का कहना है कि नोटिस का आधार मतदाता के मौजूदा विवरण और पिछली SIR की मतदाता सूची के बीच मैपिंग नहीं होना या रिकॉर्ड में विसंगति है।

There could hardly be a more powerful illustration of the absurdity of the SIR process.

At least 50 prominent Indians - politicians, senior bureaucrats, businessmen, filmmakers, sportspersons and academics - have reportedly been served notices over issues ranging from:

• Age… pic.twitter.com/ndv1bJbw85
— Pawan Khera 🇮🇳 ಪವನ್ ಖೇರಾ (@Pawankhera) September 21, 2026

47.7 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट में नहीं

यह अहम है, क्योंकि दिल्ली में SIR के तहत प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में 97.5 लाख मतदाताओं के नाम शामिल हुए हैं। 47.7 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट में नहीं हैं। इसके बाद 33.13 लाख मतदाताओं को नोटिस दिए जा रहे हैं। वैसे, दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने कहा है कि नोटिस मिलने का मतलब अपने आप मतदाता सूची से नाम हटना नहीं है। संबंधित मतदाता को जवाब देने एवं जरूरी दस्तावेज जमा करने का मौका मिलेगा।

Press note to various print and social media reports on issuance of notices to VIP/marked electors.#sir2026 #sirdelhi @ECISVEEP pic.twitter.com/AhQ0MiF57q
— CEO, Delhi Office (@CeodelhiOffice) September 20, 2026

क्यों भेजे जा रहे नोटिस?

दरअसल, SIR के तहत मतदाताओं के मौजूदा रिकॉर्ड को पिछली गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया की सूची से मिलाया जा रहा। दिल्ली के मामले में इसके लिए पिछली SIR की मतदाता सूची को आधार बनाया गया है। जिन मतदाताओं की जानकारी उस सूची से लिंक नहीं हो पाई, उन्हें unmapped with last SIR श्रेणी में रखा गया है। दूसरी श्रेणी में वो मतदाता हैं, जिनकी डिटेल्स में तार्किक विसंगतियां मिली हैं। बतौर मिसाल के तौर पर नाम की स्पेलिंग में अंतर, माता-पिता के नाम में विसंगति या परिवार के सदस्यों के रिकॉर्ड में ऐसा अंतर जिसे सिस्टम तार्किक रूप से असामान्य मानता है, नोटिस का आधार बन सकता है। दिल्ली चुनाव आयोग कार्यालय के मुताबिक ये नोटिस सिस्टम से तैयार किए गए हैं। इनका मकसद ECINET में दर्ज आंकड़ों को सुधारना है।

नोटिस पाने वाले मतदाताओं के पास क्या रास्ता?

नोटिस पाने वाले मतदाता संबंधित Electoral Registration Officer (ERO) या बूथ स्तरीय पदाधिकारी (BLO) के पास जवाब और दस्तावेज जमा कर सकते हैं। चुनाव आयोग कार्यालय ने कहा है कि दस्तावेजों की सूची सिर्फ संकेतात्मक है। अंतिम फैसला उपलब्ध दस्तावेजों और बीएलओ की रिपोर्ट के आधार पर लिया जाएगा। किसी मतदाता का नाम सुनवाई का मौका दिए बिना तथा उचित आदेश बिना हटाया नहीं जा सकता।

आडवाणी, जयशंकर और धनखड़ को क्यों नोटिस?

पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, उनकी बेटी प्रतिभा और बहू गीतिका को नोटिस मिला, क्योंकि उनके नाम 2002 की SIR सूची से मैप नहीं हुए। आडवाणी के बेटे जयंत का रिकॉर्ड मैपिंग प्रक्रिया में सफल हो गया। बता दें, ये सभी नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के मतदाता हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनकी पत्नी क्योको जयशंकर का रिकॉर्ड भी unmapped with last SIR श्रेणी में है। दोनों नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के सुनेहरी बाग में पंजीकृत मतदाता हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और उनकी पत्नी सुदेश को नोटिस मिला है। उनके मतदाता रिकॉर्ड में उपराष्ट्रपति आवास का पता है। चुनाव आयुक्त एसएस संधू मामले में नाम में अंतर को आधार बताया गया। इनके बेटे दमनबीर के मामले में माता-पिता के नाम में विसंगति बताई गई है।

इनको भी मिला नोटिस

देश के मौजूदा विदेश सचिव विक्रम मिस्री का नाम unmapped with last SIR श्रेणी में है। पूर्व सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी, सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद, सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया, जेएनयू के पूर्व कुलपति एम. जगदीश कुमार समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम सूची में हैं। पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, उनकी पत्नी सीमा व बेटे मीर को नोटिस मिला है। अधिकारियों के अनुसार सिसोदिया के नोटिस में कारण स्पष्ट नहीं किया गया। उनके बेटे के मामले में माता-पिता के नाम और उनकी पत्नी के मामले में उनके अपने नाम में विसंगति दर्ज की गई। दिवंगत अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय का नाम भी इस सूची में है। नवंबर 2024 में उनका निधन हो चुका है। उनका रिकॉर्ड unmapped with last SIR में दर्ज था। आयोग के अधिकारी ने कहा कि उनके निधन की जानकारी होने के बाद उनका नाम अंतिम सूची से बाहर किया जाएगा।

सीएम रेखा गुप्ता और केजरीवाल का भी नाम

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी नोटिस पाने वालों में शामिल हैं। रेखा गुप्ता का रिकॉर्ड दस्तावेजों की जांच के बाद सत्यापित किया जा चुका है और उनका नाम शालीमार बाग विधानसभा क्षेत्र की अंतिम सूची में शामिल किए जाने के लिए रखा गया है। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल तथा उनकी पत्नी को unmapped with last SIR श्रेणी में नोटिस मिला। सिब्बल ने SIR को लेकर चुनाव आयोग की आलोचना करते हुए इसे special intensive deletion कहा है।

कांग्रेस नेता ने उठाए सवाल

कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने आडवाणी को नोटिस थमाने पर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे वरिष्ठ नागरिकों को भी मतदाता होने का प्रमाण देने की स्थिति पैदा हो रही है। उन्होंने प्रक्रिया रद्द करने की मांग की। यह कांग्रेस नेता का राजनीतिक मत है।

दिल्ली में आगे क्या होगा?

दिल्ली में SIR का ड्राफ्ट रोल 31 अगस्त को प्रकाशित हुआ था। 1.45 करोड़ मतदाताओं में से 97.5 लाख के एन्यूमरेशन फॉर्म डिजिटाइज हुए। 47.7 लाख मतदाताओं के फॉर्म नहीं मिले या उन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लीकेट या अन्य कारणों से uncollectible श्रेणी में रखा गया। ऐसे मतदाताओं को दावा दाखिल कर सूची में शामिल होने का मौका दिया गया है। दावों और आपत्तियों की आखिरी तारीख 30 सितंबर 2026 है। नोटिसों के निपटारे की प्रक्रिया 29 अक्टूबर तक चलेगी। दिल्ली की अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर को प्रकाशित होनी है।

बिहार में SIR से क्या बदलाव आया?

देश में SIR प्रक्रिया की शुरुआत बिहार से हुई थी। वहां पिछले साल 24 जून से 30 सितंबर के बीच हुआ। 24 जून 2025 को सूबे में 7.89 करोड़ मतदाता थे। 1 अगस्त को जारी ड्राफ्ट सूची में 7.24 करोड़ मतदाता रह गए। यानी 65 लाख नाम ड्राफ्ट से बाहर थे। चुनाव आयोग के अनुसार, इन 65 लाख मामलों में 22 लाख मतदाता मृत, 36 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित या नहीं मिले। 7 लाख मतदाता एक से अधिक जगह दर्ज मिले थे। फिर दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया चली। अंतिम सूची में 21.53 लाख पात्र मतदाता जुड़े। ड्राफ्ट के बाद 3.66 लाख और नाम हटाए गए। 30 सितंबर 2025 को प्रकाशित अंतिम सूची में 7.42 करोड़ मतदाता थे।

सुप्रीम कोर्ट में दी गई थी चुनौती

बिहार SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। इस साल 27 मई को सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता बरकरार रखी। देश की शीर्ष अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची में नाम शामिल करने की पात्रता के लिए नागरिकता के संबंध में सीमित जांच करने का अधिकार है। मगर, किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण संबंधित सक्षम प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में रहेगा। कोर्ट ने कहा कि गलत तरीके से हटाए गए नामों के विरुद्ध न्यायिक उपाय उपलब्ध हैं। बिहार के के बाद SIR देश के अन्य हिस्सों में बढ़ी। इस दौरान दस्तावेजों की जांच, मैपिंग, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान तथा दोहरे रिकॉर्ड हटाने जैसे मुद्दे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बने।

यूपी में सबसे बड़ा पैमाना

उत्तर प्रदेश (UP) में SIR का दूसरा चरण 27 अक्टूबर 2025 से 10 अप्रैल 2026 तक चला है। यह अभियान सभी 75 जिलों और 403 विधानसभा क्षेत्रों में हुआ। SIR शुरू होने से पहले यूपी में 15.44 करोड़ मतदाता दर्ज थे। 6 जनवरी 2026 को जारी ड्राफ्ट सूची में 12.55 करोड़ मतदाता रह गए थे। यानी 2.89 करोड़ नाम ड्राफ्ट चरण में बाहर हुए। दावों-आपत्तियों और सत्यापन के बाद अंतिम सूची में 84.28 लाख नाम जोड़े गए। 8.15 लाख नाम और हटाए गए। 10 अप्रैल को जारी अंतिम सूची में 13,39,84,792 मतदाता दर्ज हुए। ऐसी ही शुरुआत के 15.44 करोड़ के मुकाबले अंतिम सूची में 2.04-2.05 करोड़ कम मतदाता रहे। अंतिम सूची में 7.31 करोड़ पुरुष, 6.09 करोड़ महिला और 4,206 तीसरे लिंग के मतदाता हैं। यूपी की SIR प्रक्रिया में भी नो मैपिंग और लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी वाले मतदाताओं के लिए अलग सूचियां और नोटिस प्रक्रिया रही। विभिन्न जिला निर्वाचन कार्यालयों की वेबसाइटों पर SIR 2026 के तहत इन श्रेणियों की सूचियां उपलब्ध कराई गई हैं।

क्यों पश्चिम बंगाल में अलग रहा मामला?

पश्चिम बंगाल में SIR का मामला काफी अलग रहा, क्योंकि बड़ी संख्या में मतदाताओं के मामलों को न्यायिक अधिकारियों के सामने जांच के लिए रखा गया। 60.06 लाख मतदाता अंडर एडज्यूडिकशन श्रेणी में आए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 700 न्यायिक अधिकारियों ने इन मामलों की जांच की। उनके आदेश पर 27.16 लाख नाम हटाए और 32.9 लाख नाम जोड़े गए। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अपील की व्यवस्था बनाई गई। चुनाव आयोग ने 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए थे। उनमें से हर की अध्यक्षता सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज कर रहे। ये ट्रिब्यूनल अप्रैल 2026 से काम कर रहे। इस महीने बंगाल SIR से जुड़ा नया आंकड़ा सामने आया है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 38.31 लाख अपील दायर की गई है। इनमें 22.21 लाख अपील उन मतदाताओं की हैं, जिनके नाम हटाए गए थे। वे दोबारा जोड़ने की मांग कर रहे। बाकी 16.10 लाख अपीलें अन्य समावेशन/ हटाने से जुड़े मामलों की हैं। 19 सितंबर तक इनमें से केवल 1.02 लाख मामलों का निपटारा हुआ था। आयोग के मुताबिक 27.16 लाख हटाए गए मतदाताओं में से 82% ने अपील की है। आयोग ने अपीलीय ट्रिब्यूनलों की संख्या बढ़ाने का सुझाव भी दिया है, जिससे लंबित मामलों का निपटारा तेजी से हो सके।

बंगाल, बिहार-यूपी और दिल्ली की कहानी में क्या अंतर?

बिहार, यूपी और पश्चिम बंगाल में SIR के बाद मतदाता सूची में बड़े बदलाव हुए हैं। मगर राज्यों की प्रक्रिया और अंतिम स्थिति एक जैसी नहीं रही। बिहार में 7.89 करोड़ से अंतिम सूची में 7.42 करोड़ मतदाता रहे। यूपी में 15.44 करोड़ से घटकर अंतिम सूची 13.39 करोड़ पहुंची। बंगाल में बड़ी संख्या में मामले अंडर एडज्यूडिकशन रहे और बाद में न्यायिक अधिकारियों एवं अपीलीय ट्रिब्यूनलों की भूमिका आई। अभी दिल्ली में तस्वीर अलग चरण में है। यहां 31 अगस्त को ड्राफ्ट सूची प्रकाशित हुई है। 33.13 लाख मतदाताओं को विवरण की विसंगतियों के संबंध में नोटिस दिए जा रहे। अंतिम सूची नवंबर में आएगी। इस वजह से किसी व्यक्ति को नोटिस मिलना और उसका नाम अंतिम रूप से मतदाता सूची से हटना-दो अलग प्रक्रियाएं हैं। यही वजह है कि दिल्ली के मौजूदा SIR विवाद को समझते समय नोटिस, ड्राफ्ट से नाम बाहर होना और अंतिम मतदाता सूची से नाम हटना-इन तीनों को एक चीज नहीं माना जा सकता है। चुनाव आयोग का कहना है कि नोटिस पाने वाले मतदाताओं को पक्ष रखने का मौका देंगे। दस्तावेजों और सत्यापन बाद अंतिम निर्णय होगा। दिल्ली की अंतिम SIR सूची 4 नवंबर को प्रकाशित होनी है।