UP Latest Political News : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा (BJP) अपनी सियासी ताकत को और मजबूत करने की कवायद में जुटी है। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी के तीन बागी विधायक-राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी 14 अक्टूबर को बीजेपी का दामन थामने जा रहे। तीनों नेताओं के पार्टी में शामिल होने से जहां एक तरफ समाजवादी पार्टी को बहुत बड़ा झटका लगना तय माना जा रहा, वहीं दूसरी तरफ खुद बीजेपी के भीतर भी अंदरूनी चुनौतियां खड़ी होती दिख रही हैं। पार्टी के सामने सबसे बड़ा और पेचीदा सवाल यह होगा कि इन नए चेहरों को चुनावी मैदान में आखिर किस सीट से टिकट देकर उतारा जाए। अमेठी की गौरीगंज और अयोध्या की गोसाईंगंज सीटों पर पुराने दावेदारों और नए समीकरणों के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है। इससे पार्टी में ठाकुर बनाम ब्राह्मण की सियासी खींचतान तेज होने के पूरे आसार हैं।

गौरीगंज सीट पर राकेश प्रताप सिंह की एंट्री और मटियारी की चुनौती

अमेठी जिले की गौरीगंज सीट से विधायक राकेश प्रताप सिंह 2012 से सपा के टिकट पर चुनाव जीत रहे। साल 2024 के बहुचर्चित राज्यसभा चुनाव के दौरान उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर दी थी। उसके बाद से सपा के साथ उनका विवाद गहराता गया और अंततः पार्टी ने जून 2025 में उन्हें निष्कासित कर दिया था। अब उनका BJP में प्रवेश करीब-करीब तय है। मगर, यहां सत्तारूढ़ दल के सामने साल 2022 के चुनाव में बीजेपी के टिकट पर मैदान में उतरे पूर्व प्रत्याशी चंद्र प्रकाश मिश्र मटियारी को साधना बड़ी चुनौती होगी। मटियारी का गौरीगंज क्षेत्र में खुद का मजबूत राजनीतिक रसूख और प्रभाव है। उन्होंने कह दिया है कि सिर्फ पार्टी में शामिल होने भर से किसी को चुनावी टिकट की गारंटी नहीं मिल जाती। उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की बात दोहराते हुए यह भी स्पष्ट किया कि इस पर अंतिम फैसला पार्टी और संगठन के शीर्ष नेतृत्व को ही करना है। ऐसे में बीजेपी राकेश प्रताप सिंह को गौरीगंज से उम्मीदवार बनाती है तो चंद्र प्रकाश मिश्र मटियारी की दावेदारी पर सीधा असर पड़ना तय है। पार्टी के सामने केवल एक मजबूत उम्मीदवार चुनने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि स्थानीय नेताओं और उनके नाराज समर्थकों को एकजुट बनाए रखना भी बड़ी परीक्षा होगी।

गोसाईंगंज सीट पर अभय सिंह बनाम खब्बू तिवारी का पुराना समीकरण

अयोध्या की हॉट सीट गोसाईंगंज में भी बीजेपी की मुश्किलें बढ़ने के पूरे संकेत हैं। इस सीट से विधायक अभय सिंह अब BJP का हिस्सा बन रहे। जबकि दूसरी तरफ पूर्व विधायक इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी इस पूरे क्षेत्र में बीजेपी के सबसे कद्दावर और प्रमुख ब्राह्मण चेहरों में गिने जाते हैं। अभय सिंह ने साल 2012 में पहली बार सपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी। साल 2017 के चुनाव में उन्हें खब्बू तिवारी ने मात दी थी, लेकिन 2022 के चुनाव में अभय सिंह ने फिर वापसी करते हुए जीत हासिल की थी। इन दोनों नेताओं के बीच पुराना और कड़ा राजनीतिक संघर्ष जगजाहिर है। अब सबसे बड़ा सवाल है कि बीजेपी साल 2027 के विधानसभा चुनाव में गोसाईंगंज से किस पर भरोसा जताएगी। अभय सिंह को दोबारा इसी सीट से चुनावी मैदान में उतारा जाता है तो खब्बू तिवारी की दावेदारी खतरे में पड़ सकती है। इसके उलट पार्टी पुराने नेता की अनदेखी करती है तो स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण बिगड़ सकते हैं। यही कारण है कि अभय सिंह के बीजेपी में शामिल होने को केवल सपा के एक विधायक के पाला बदलने के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके साथ गोसाईंगंज की पुरानी सियासी रंजिश और टिकट की खींचतान सीधे तौर पर जुड़ी है।

कालपी सीट पर विनोद चतुर्वेदी के सामने नया इम्तिहान

जालौन जिले की कालपी विधानसभा सीट से विधायक विनोद चतुर्वेदी भी बीजेपी का रुख करने जा रहे हैं। उनका राजनीतिक करियर कांग्रेस पार्टी से शुरू हुआ था। वह साल 2007 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधायक बने थे और बाद में समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे। साल 2022 के चुनाव में वो सपा के टिकट पर कालपी से जीते थे। तब विनोद चतुर्वेदी ने निषाद पार्टी के उम्मीदवार छोटे सिंह को 2816 वोटों से शिकस्त दी थी। खास बात है कि छोटे सिंह उस समय बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार थे। अब विनोद चतुर्वेदी के बीजेपी में आने से कालपी सीट पर भी पुराने दावेदारों और नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। वैसे, इस सीट के समीकरण को सीधे तौर पर ठाकुर बनाम ब्राह्मण की लड़ाई मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। 

BJP के सामने जातीय संतुलन साधने की बड़ी चुनौती

इन तीनों बागी विधायकों को पार्टी में शामिल करना यकीनन बीजेपी के लिए अपनी चुनावी ताकत को विस्तार देने का एक बेहतरीन मौका है, क्योंकि ये नेता अपने-अपने क्षेत्रों में लंबा चुनावी अनुभव और अच्छा खासा स्थानीय प्रभाव रखते हैं। वैसे, चुनाव के वक्त नए चेहरों को आगे बढ़ाते हुए अपने पुराने और वफादार दावेदारों की नाराजगी मोल लेने से बचना भी पार्टी के लिए बेहद जरूरी होगा। गौरीगंज और गोसाईंगंज जैसी सीटों पर इन नए नेताओं की दावेदारी का सीधा असर बीजेपी के पुराने और स्थापित ब्राह्मण चेहरों पर पड़ सकता है। इस तरह कालपी में भी पार्टी को अपने पुराने सहयोगियों और स्थानीय कार्यकर्ताओं के हितों का पूरा ख्याल रखना होगा। विपक्ष इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को बीजेपी के भीतर जातीय असंतुलन और अंतर्कलह के मुद्दे के तौर पर भुनाने की पूरी कोशिश कर सकता है। टिकट बंटवारे के दौरान किसी भी प्रभावशाली और सीनियर नेता की अनदेखी की जाती है तो उसका नकारात्मक असर उस एक सीट से आगे बढ़कर आसपास के कई इलाकों पर भी पड़ सकता है।

समाजवादी पार्टी को लगेगा तगड़ा झटका

इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन तीनों विधायकों के आने से समाजवादी पार्टी को तगड़ा सियासी झटका लगा है, लेकिन बीजेपी के लिए असली अग्निपरीक्षा इन्हें पार्टी में शामिल कराने के ठीक बाद शुरू होगी। पार्टी को यह तय करना होगा कि इन नए नेताओं को संगठन में क्या जिम्मेदारी दी जाए और साथ ही पुराने दावेदारों की राजनीतिक जमीन को सुरक्षित कैसे रखा जाए। फिलहाल राजनीतिक गलियारों की सबसे ज्यादा नजरें गौरीगंज और गोसाईंगंज पर टिकी हैं, जहां राकेश प्रताप सिंह और अभय सिंह की संभावित दावेदारी वहां के पुराने नेताओं के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द बन सकती है।

इन तीनों नेताओं के अनुभवों को BJP उठा सकती है फायदा

बीजेपी इस नाजुक संतुलन को साधने में पूरी तरह सफल रही तो इन अनुभवी नेताओं का साथ उसे चुनाव में बड़ा फायदा पहुंचा सकता है। लेकिन अगर टिकट वितरण के सवाल पर तालमेल जरा भी बिगड़ा, तो यही दल-बदल पार्टी के भीतर बड़े आंतरिक असंतोष और बगावत की वजह बन सकता है। ऐसे में साल 2027 की चुनावी जंग से पहले मुख्य सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सपा के ये तीन विधायक बीजेपी में क्यों आ रहे हैं, बल्कि असली सवाल यह है कि इनकी एंट्री के बाद बीजेपी अपने पुराने वफादारों और नए चेहरों के बीच सामंजस्य कैसे बिठाएगी।