दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जारी विरोध प्रदर्शन के बीच सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों की अवैध हिरासत पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। रविवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और मेट्रो प्रशासन से जवाब मांगा। इसके बावजूद राजधानी में प्रदर्शन के दूसरे दिन भी कई जगहों पर लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आईं। अदालत ने इंटरनेट सेवाएं सामान्य रखने, सार्वजनिक परिवहन सुचारू करने और लोगों की आवाजाही सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।
कोर्ट ने केंद्र और पुलिस से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल निगम की प्रमुख डी. थारा को नोटिस जारी किया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि 9 अक्टूबर को अदालत के दिए गए निर्देशों के बावजूद दिल्ली में मेट्रो और रेल सेवाओं पर व्यापक पाबंदियां लगाई गईं और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने प्रथम दृष्टया मामला पेश किया है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से 13 अक्टूबर तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।
दूसरे दिन भी कई जगहों पर हिरासत की कार्रवाई
रिपोर्टों के मुताबिक, रविवार को दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में प्रदर्शनकारियों के छोटे समूहों ने विरोध जताया। कनॉट प्लेस और आसपास के क्षेत्रों में कई जगह अचानक प्रदर्शन हुए, जिसके बाद पुलिस ने लोगों को हिरासत में लिया। रविवार को हुई कार्रवाई में लगभग 700 लोगों को हिरासत में लिए जाने का दावा किया जा रहा है, पुलिस प्रशासन ने इस आंकड़े को खारिज करते हुए केवल 400 लोगों को पकड़े जाने की बात कही है। इनमें कुछ लोग प्रदर्शन स्थलों से दूर भी पकड़े गए होने के आरोप हैं। हिरासत में लिए गए लोगों की अंतिम संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं।
छात्रों और महिला प्रदर्शनकारी भी हिरासत
रविवार को दोपहर करीब 2:30 बजे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के सदस्यों ने आरके आश्रम मार्ग मेट्रो स्टेशन के पास उग्र प्रदर्शन किया। पुलिस के एक्शन में आने के बाद कुछ प्रदर्शनकारी कनॉट प्लेस की ओर कूच कर गए, जहाँ से उन्हें भी हिरासत में लिए जाने की खबर है। शाम करीब सात बजे स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के सदस्यों ने कनॉट प्लेस में महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित पुलिस दुर्व्यवहार के विरोध में तिरंगा मार्च निकालने की कोशिश की। इस दौरान प्रदर्शनकारियों को बसों में बैठाकर ले जाया गया। संगठन के महासचिव सृजन भट्टाचार्य ने सवाल उठाया कि शाम के समय महिलाओं को हिरासत में लेने की क्या जरूरत थी।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां प्रतिबंधात्मक आदेश लागू नहीं हैं, वहां शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के एकत्र हुए लोगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को इंटरनेट कनेक्टिविटी सामान्य करने और शहर में लोगों की आवाजाही सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए। पीठ ने कहा कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को अपना काम करने से किसी भी तरह नहीं रोका जाना चाहिए। अदालत परिसर के आसपास लगाए गए प्रतिबंधों की समीक्षा करने और वकीलों तथा मुकदमे से जुड़े लोगों की पहुंच आसान बनाने पर भी जोर दिया गया।
मेट्रो सेवाओं और बैरिकेडिंग पर भी उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि प्रदर्शनों के कारण दिल्ली में मेट्रो और रेल सेवाओं को पूरी तरह ठप न किया जाए। अदालत ने यह छूट भी दी कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के मद्देनज़र प्रशासन परिचालन को आवश्यकतानुसार नियंत्रित कर सकता है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अधिकारियों की ओर से दलील दी कि मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चल रही थीं और कुछ स्टेशनों पर प्रतिबंध कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगाए गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि शनिवार रात से सभी मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए और इंटरनेट कनेक्टिविटी बहाल कर दी गई। अदालत ने बैरिकेडिंग की समीक्षा करने और यातायात तथा सुरक्षा की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लोगों की आवाजाही में अनावश्यक बाधा दूर करने को कहा।
कपिल सिब्बल ने पुलिस कार्रवाई पर जताई आपत्ति
वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल के नेतृत्व में 100 से अधिक वकीलों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई पुलिसिया कार्रवाई पर कड़ा ऐतराज जताया और उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन इलाकों से भी लोगों को हिरासत में लिया, जहाँ कोई भी निषेधाज्ञा या प्रतिबंध लागू नहीं था। उन्होंने इंटरनेट सेवाओं पर रोक और वकीलों को हिरासत में लेने का मुद्दा भी उठाया। वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने अदालत को बताया कि हिरासत में लिए जाने के दौरान उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने घटनाक्रम पर गंभीर आपत्ति जताई। दूसरी ओर, सॉलिसिटर जनरल ने अधिकारियों की कार्रवाई का बचाव किया और कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाए गए थे।
अब 13 अक्टूबर तक जवाब दाखिल करेंगे अधिकारी
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत के इन आदेशों का मुख्य ध्येय शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और आम नागरिकों की सहूलियत के बीच सामंजस्य बिठाना है, ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे और मेट्रो व रेल जैसी आवश्यक सेवाएँ भी बाधित न हों। अब इस मामले में 13 अक्टूबर तक अधिकारियों की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब और अदालत की अगली कार्रवाई पर नजर रहेगी।