West Bengal SIR News : पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत मतदाताओं की अपीलों पर सुनवाई कर रहे जजों और चुनाव आयोग के बीच का विवाद अब बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। चुनाव आयोग की ओर से जजों को अपनी पहचान प्रमाणित करने के लिए पैन कार्ड और सरकारी आईडी जमा करने का निर्देश दिया गया है। आयोग के इस फरमान से नाराज होकर न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के जजों ने ऑनलाइन पोर्टल पर काम करने से साफ इनकार कर दिया है। नतीजा यह है कि 21 सितंबर से अपीलों के निपटारे का पूरा कामकाज ठप पड़ा है।

पिछले सप्ताह क्या आदेश दिया था?

प्रसिद्ध मीडिया संस्थान इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल एसआईआर अपीलीय न्यायाधिकरणों के जजों द्वारा आधार ऑथेंटिकेशन फीचर के विरोध में पोर्टल पर लॉग इन न करने के एक महीने से अधिक समय बीतने के बाद चुनाव आयोग ने पिछले सप्ताह उनसे डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट तैयार करवाने को कहा है। इसके लिए उन्हें अपने पैन कार्ड और सरकारी पहचान पत्रों का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर नियुक्त इन जजों ने पहले 24 सितंबर को पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी (ACEO) को पत्र लिखकर पोर्टल से आधार प्रमाणीकरण की अनिवार्यता हटाने की गुहार लगाई थी। यह नया फीचर 21 सितंबर को उस वक्त जोड़ा गया था, जब चुनाव आयोग की आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना ने जजों के सामने एक प्रेजेंटेशन दी थी।

अधर में 37 लाख से ज्यादा मतदाताओं का भविष्य 

इस प्रशासनिक खींचतान और आमने-सामने की जंग का सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है, जिसका भविष्य फिलहाल अधर में लटका हुआ है। निर्वाचन आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में जमा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, कुल 38.31 लाख अपीलों में से अभी तक केवल 1.26 लाख मामलों का ही निपटारा हो सका है। पिछले एक महीने से ज्यादा वक्त से जजों ने पोर्टल पर लॉगिन नहीं किया है और वे केवल ऑफलाइन माध्यम से ही कार्य कर रहे हैं। इसकी वजह से लाखों मतदाता अपने मताधिकार की बहाली और नाम जुड़वाने या कटवाने से जुड़े फैसलों का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

निजी एजेंसी, वीडियो सत्यापन और 2300 रुपये का शुल्क

इस पूरे विवाद की शुरुआत 21 सितंबर को हुई थी, जब चुनाव आयोग ने पोर्टल पर आधार ऑथेंटिकेशन को अनिवार्य बना दिया था, जिसका जजों ने कड़ा विरोध किया। जजों के सख्त रुख को देखते हुए 24 सितंबर को न्यायाधिकरण के अधिकारियों ने एमीसीईओ (ACEO) को पत्र भेजकर आधार स्क्रीन हटाने की मांग की थी। इसके जवाब में मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय ने जजों से कहा कि वे एक निजी एजेंसी के जरिए अपना डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) बनवाएं। एजेंसी द्वारा 28 अक्टूबर को सीईओ को भेजे गए एक ईमेल के अनुसार इस प्रक्रिया के तहत जजों को अपने पैन कार्ड और सरकारी पहचान पत्र की रंगीन स्कैन कॉपी, एक रंगीन फोटो, चालू मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी, अधिकृत व्यक्ति का सरकारी परिचय पत्र और एक ऑथराइजेशन लेटर (प्राधिकरण पत्र) देना होगा। इस वेरिफिकेशन प्रक्रिया में जजों के फोन और ईमेल पर भेजे जाने वाले वन-टाइम पासवर्ड (OTP) के अलावा एक वीडियो वेरिफिकेशन भी शामिल है, जिसमें आवेदक को अपना मूल पैन कार्ड और सरकारी पहचान पत्र कैमरे पर दिखाना होगा। सरकारी नियमों और तय दरों के मुताबिक प्रत्येक डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट की फीस 2300 रुपये है।

क्या है इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि?

यह सारा विवाद पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण और पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। इसी साल 20 फरवरी को तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस सरकार और चुनाव आयोग के बीच आपसी विश्वास की कमी को भांपते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को मतदाताओं की पात्रता की जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। उस दौरान न्यायिक अधिकारियों ने करीब 60.06 लाख मतदाताओं के मामलों की गहराई से जांच की और अंततः 27.16 लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए थे। इसके बाद, 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इन नामों को हटाने या नए नाम शामिल करने के खिलाफ आने वाली अपीलों पर निष्पक्ष फैसले लेने के लिए विशेष ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) गठित करने का आदेश दिया था, जो अब इस बड़े प्रशासनिक और कानूनी टकराव के केंद्र में आ गया है।