करीब 128 साल बाद क्रिकेट की ओलंपिक में वापसी होने जा रही है। लॉस एंजेलिस ओलंपिक 2028 में क्रिकेट को शामिल किए जाने के साथ ही इस खेल के लिए कई नए नियम और जिम्मेदारियां भी बढ़ेंगी। इनमें सबसे अहम है एंटी-डोपिंग व्यवस्था। वर्ल्ड एंटी-डोपिंग एजेंसी (WADA) ने इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) को अपने सिग्नेटरी टियर सिस्टम में Tier-2 से अपग्रेड करके Tier-1 में शामिल कर दिया है। यह बदलाव 1 जनवरी 2027 से लागू होगा। इसका मतलब है कि अब ICC को डोपिंग रोकने और उससे जुड़े नियमों के पालन के लिए ज्यादा सख्त निगरानी और तय समयसीमा के तहत काम करना होगा। इसका असर भारतीय क्रिकेटरों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की एंटी-डोपिंग प्रक्रिया का पालन करना होगा।

क्या है WADA का Tier-1 दर्जा?

WADA अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय खेल महासंघों को उनके ओलंपिक या पैरालंपिक कार्यक्रम में शामिल होने और खेल से जुड़े डोपिंग जोखिम के आधार पर अलग-अलग टियर में रखता है। क्रिकेट को लॉस एंजेलिस ओलंपिक 2028 में जगह मिलने के बाद ICC को Tier-1 में अपग्रेड किया गया है। इस श्रेणी में आने के बाद ICC को एंटी-डोपिंग नियमों के पालन की नियमित निगरानी, खिलाड़ियों के नमूनों की जांच और नतीजों के प्रबंधन से जुड़े मानकों पर ज्यादा ध्यान देना होगा। इसमें मिनिमम लेवल्स ऑफ एनालिसिस (MLA) और थेराप्यूटिक यूज एग्जेम्प्शन (TUE) की प्रक्रिया भी शामिल है। TUE के तहत किसी खिलाड़ी को चिकित्सकीय जरूरत के कारण प्रतिबंधित दवा के इस्तेमाल की विशेष अनुमति मिल सकती है। अब इस व्यवस्था के प्रबंधन और निगरानी में भी सख्ती बरती जाएगी।

नियमों की अनदेखी पर तय समय में कार्रवाई

Tier-1 का दर्जा मिलने के बाद ICC को एंटी-डोपिंग व्यवस्था में सामने आने वाली कमियों को तय समयसीमा में दूर करना होगा। रिपोर्ट के मुताबिक, गंभीर कमियों को तीन महीने, हाई-प्रायोरिटी कमियों को छह महीने और डेटा प्राइवेसी से जुड़ी सामान्य जरूरतों को नौ महीने के भीतर ठीक करना होगा। अगर संबंधित संस्था तय समय में जरूरी सुधार नहीं करती है, तो उसके खिलाफ अनुपालन संबंधी कार्रवाई शुरू हो सकती है। हालांकि, ICC का Tier-1 में आना अपने आप में किसी नियम के उल्लंघन या डोपिंग मामले का संकेत नहीं है। यह WADA की ओर से निगरानी के स्तर में किया गया बदलाव है।

भारतीय क्रिकेटरों के सामने क्यों बढ़ेगी चुनौती?

भारत में क्रिकेट का दायरा अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों से लेकर घरेलू क्रिकेट और फ्रेंचाइजी लीग तक फैला हुआ है। खिलाड़ियों के साथ डॉक्टर, फिजियोथेरेपिस्ट, फिटनेस ट्रेनर और न्यूट्रिशनिस्ट की पूरी टीम काम करती है। ऐसे में एंटी-डोपिंग नियमों का पालन केवल खिलाड़ी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उसके सहयोगी स्टाफ के लिए भी अहम होगा। खिलाड़ियों को दवाओं और सप्लीमेंट्स के इस्तेमाल में ज्यादा सावधानी रखनी होगी। किसी भी दवा या सप्लीमेंट में प्रतिबंधित पदार्थ होने की आशंका को नजरअंदाज करना उनके लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है। इसके अलावा, खिलाड़ियों को अपनी उपलब्धता और ठहरने की जानकारी से जुड़े नियमों का भी पालन करना पड़ सकता है, ताकि जरूरत पड़ने पर उनकी जांच की जा सके। भारत पहले से ही WADA की राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग एजेंसियों वाली अलग Tier-1 श्रेणी में शामिल है। यह ICC के टियर से अलग वर्गीकरण है। इसलिए भारतीय क्रिकेटरों और भारतीय खेल व्यवस्था पर लागू होने वाली निगरानी को समझने के लिए इन दोनों श्रेणियों के बीच अंतर जानना जरूरी है।

हर क्रिकेटर का बार-बार होगा डोप टेस्ट?

ICC का Tier-1 में आना यह नहीं बताता कि अब हर क्रिकेटर का बार-बार डोप टेस्ट होगा या हर जांच ICC खुद करेगी। इसका मुख्य उद्देश्य एंटी-डोपिंग व्यवस्था को मजबूत करना, जांच के मानकों को बेहतर बनाना और नियमों के पालन की निगरानी बढ़ाना है। क्रिकेट में अभी भी ICC और राष्ट्रीय क्रिकेट बोर्ड अपने-अपने एंटी-डोपिंग कार्यक्रम चलाते हैं। ओलंपिक में शामिल होने के बाद खिलाड़ियों को संबंधित प्रतियोगिता और एंटी-डोपिंग एजेंसियों के नियमों का भी ध्यान रखना होगा। इस कारण खिलाड़ियों को एक से अधिक जांच प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ सकता है।

1900 के बाद ओलंपिक में लौटेगा क्रिकेट

क्रिकेट ने अब तक सिर्फ एक बार ओलंपिक में हिस्सा लिया है। साल 1900 में पेरिस ओलंपिक के दौरान क्रिकेट खेला गया था। इसके बाद यह खेल ओलंपिक कार्यक्रम से बाहर रहा। अब लॉस एंजेलिस ओलंपिक 2028 में क्रिकेट की वापसी होगी। इस वापसी के साथ ICC के सामने खेल के विस्तार के अलावा अंतरराष्ट्रीय एंटी-डोपिंग मानकों पर खरा उतरने की जिम्मेदारी भी होगी। खिलाड़ियों के लिए भी मैदान पर प्रदर्शन के साथ दवाओं, सप्लीमेंट्स और जांच से जुड़े नियमों का पालन करना पहले से ज्यादा जरूरी हो जाएगा।